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सुना था कभी बचपन में "खुदी को कर इतना बुलंद बन्दे, की हर तकदीर से पहले, खुदा तुझ से पूछे बोल तेरी रजा क्या है" जो लोग सफलता पाने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं ये लाइनें उन पर फिट बैठती हैं. खुद को उसी धारा से जोड़कर चल पड़े हैं, अभी रास्ते में हूँ यही कहना ठीक है. सफलता के चरम को पा सकेंगे ये जुनून है दिल में, अभी इन्तजार है सही वक्त का. जब स्थितियां अनुकूल न हों, तो सही वक्त का इंतजार करना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। मुश्किल वक्त का प्रयोग खुद को मजबूत करने में करना चाहिए। स्लो-डाउन से तो लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हुए हैं, मेरा ये ब्लॉग एक कोशिश है, खुद को, अपने विचारो को दूसरों से विनिमय करने की. आपकी आलोचना भी सह सकता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है की हमारे प्यारे आलोचक भी हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, प्रेरणा देने के लिए बस जरूरत है लेख के धरातल पर टिप्पणी नामक अंगूठा लगाने की. इसी उम्मीद के साथ आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है.....

बुधवार, 27 अक्तूबर 2010

पैरेंट्स का आशीर्वाद यानी आल द बेस्ट!


हमारा समाज आज भी पुरानी मान्यताओं और परंपराओं से जुड़ा है। हम वातावरण, कपड़ों और कॅरिअर के नजरिए से आधुनिक जरूर हुए हैं, पर सोच अभी भी पूरी तरह से नहीं बदली है। सपने देखने में कोई बुराई नहीं, पर असल जिंदगी में उनका शत-प्रतिशत सही होना मुश्किल होता है। रिश्ता बनाने से पहले अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करना आवश्यक होता है। अगर 50 प्रतिशत युवा प्रेम विवाह के पक्ष में हैं, तो 50 प्रतिशत पारिवारिक सहमति से नियोजित विवाह करना चाहते हैं। आइडियल कोई नहीं होता, भले ही आप प्रेम करके शादी करें पर रिश्तों की असलियत धीरे-धीरे ही सामने आती है। दरअसल, शादी दो जिंदगियों के मेल से जुड़ा यक्ष प्रश्न है। अब शादी तो करनी ही है पर कौन सी वाली करें? यानी लव मैरिज (प्रेम विवाह) या अरेंज मैरिज (नियोजित विवाह) करें। मॉडर्न ख्यालों से सराबोर 21वीं सदी की पीढ़ी आज भी लव कम अरेंज मैरिज के कांसेप्ट में रुचि ले रही है। अरेंज मैरिज एक ऐसा मंच है जहां दो लोगों, परिवारों को आमने-सामने आकर एक-दूसरे को जानने, समझने और परखने के बाद संबंधों को जोड़ने का अवसर मिलता है।
जिस तरह प्रेम विवाह में आप पहले से एक दूसरे को जानते हैं, वैसा ही मौका आपको नियोजित विवाह में भी मिलता है।
         प्रेम संबंध एक ऐसा संबंध है जिसमें आपकी भावनाओं की कद्र हो। पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास की नींव पर टिका होता है। जब यह विश्वास संशय में बदल जाता है तब वैवाहिक जीवन पर संकट के बादल गहराने लगते हैं। इस स्थिति से कैसा उबरा जाये इस प्रश्न का उत्तर हमें तलाशना चाहिए।
अनुशासन बनाए रखने का माध्यम
           प्राचीन काल में विवाह समाज में अनुशासन तथा व्यवस्था बनाये रखने का माध्यम रहा है।  नियोजित विवाह पद्धति के बिना समाज मुक्त यौन संबंधों की अराजकता में भटक गया होता। नियोजित विवाह का स्वरूप, प्रकृति एवं क्रिया विधि विभिन्न समाजों में एक प्रकार की नहीं होतीं। एडवर्ड वैस्टरमार्क के अनुसार विवाह का अर्थ नियमों तथा रीति-रिवाजों के संयोजन से है, अर्थात किसका विवाह किससे किस विधि एवं किस परिस्थिति में होगा। विवाह होने के बाद दांपत्य में बंधने वाले स्त्री-पुरुष के अधिकार एवं कर्त्तव्य किस प्रकार के तथा कैसे होंगे साथ ही आपस में अनबन हो जाने पर वह किस प्रकार अलग हो सकते हैं। नियोजित विवाह स्त्री-पुरुष का सामाजिक दृष्टि से स्वीकार किया गया तथा मूल्यों की दृष्टि से वांछनीय बंधन है। इस सूत्र में बंधने के बाद यह तय हो जाता है कि विवाहोपरांत पति-पत्नी बने दोनों पक्षों में यौन, आर्थिक अधिकारों का आदान-प्रदान नाजायज नहीं।
            इसके विपरीत आज की युवा पीढ़ी विवाह को मात्र वासना प्रधान प्रेम का रंग दे रही है। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रेम विवाह कर प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकषर्ण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। आज का युवा पत्नी का चुनाव शारीरिक आकषर्ण को ध्यान में रखकर  ही करता है। अगर प्रेम विवाह कर भी लिया जाए तो मात्र आकर्षण के बलबूते दांपत्य जीवन लंबे समय तक नहीं चल पाता। कुछ लोग परिवारजनों से बगावत कर अलग दुनिया बसाने का रंगीन सपना संजो लेते हैं। लेकिन जब यही आकर्षण कम हो जाता है और पारिवारिक जिम्मेदारियां समझ में आती हैं तब स्थिति बदल जाती है यानि प्रेम विवाह के दुष्परिणाम सामने आते हैं। अब ऐसे में सिवाए पछताने के और कोई विकल्प नहीं होता।
           समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकषर्ण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए। शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दयर् देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए। इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है। अत: दोनों पक्षों को एक-दूसरे से आकषर्ण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है।  जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने विश्वास और सफल   जीवन व्यतीत करने की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। उन्हें बताया जाता है कि कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने दुर्व्यवहार रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा। वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो।  दोनों अपनी इच्छा आवश्कता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा।  इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है। इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बन्धन में बँधें। विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए।  यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए ।
माता-पिता पर रखें विश्वास
बचपन से बडेÞ होने तक माता-पिता हर तरह की जिम्मेदारी निभाते हैं। इसलिए शायद यह उनके अधिकार क्षेत्र में आता है कि वे अपने बच्चों की शादी भी अपनी समझदारी और बच्चों की पसंद से करें।
शादी को लेकर लड़के-लड़की के मन में एक इनफिनिट प्रेम होता है। जिसमें सबकी पसंद अक्सर एक जैसी होती है, यानि अच्छा वर, अच्छा घर, अच्छा आचरण, गुड लुकिंग, एजुकेटेड तथा समझदार हो। कहने का तात्पर्य है सब कुछ अच्छा चाहिए। पर जहां अरेंज मैरिज (नियोजित विवाह) की बात आती है, तब शादी के इच्छुक लड़के-लड़कियां माता-पिता की मर्जी से शादी करने में खुद को सुरक्षित पाते हैं। सुरक्षा का आवरण पाते ही, शादी से जुड़ा डर दूर हो जाता है। वे सारी शर्तें माता-पिता को बताकर ‘उनका भावी जीवन साथी कैसा हो’ खुद बेफिक्र हो जाते हैं इसलिए कि उनके माता-पिता उनके भविष्य को लेकर चिंतित व चौकस हैं।
          हमारे समाज में मान्यताओं के अनुसार अरेंज मैरिज सम्मान की ज्यादा हकदार होती है। प्रेम विवाह जैसी मुश्किलें अरेंज मैरिज में नहीं रहतीं। जहां पहले किसी से प्यार होता है फिर अगर घर-परिवार वाले रजामंद न हों तो बैठकर रोते रहो। नियोजित विवाह हमें ऐसे झंझटों से बचाता है। शादी कोई बच्चों का खेल नहीं! आप इस मैदान के नये खिलाड़ी हो सकते हैं पर माता-पिता सब कुछ जानने-पहचानने के बाद ही आपकी शादी करते हैं। अपने बच्चों की शादी को लेकर हर माता-पिता के ढेरों सपने होते हैं। फिर वे किसी गलत व्यक्ति से नाता जोड़कर हम पर भला कैसे थोप सकेंगे। नियोजित विवाह में बकायदा हमारी राय सिर्फ इसलिए ही पूछी जाती है।
          ऐसा नहीं कि हमेशा अरेंज मैरिज ही सफल सिद्ध हो यह भी कभी-कभी आपसी सामजस्य सही न बैठने पर असफल हो जाती है। लेकिन प्रेम विवाह करने के बाद पति-पत्नी में यदि झगड़े बढ़ जाते हैं, चूंकि यह फैसला उनका अपना होता है माता-पिता तथा अन्य परिजनों की इच्छा के खिलाफ किया था इसलिए उनकी इजाजत के बिना ही वह सम्बन्ध विच्छेद भी कर लेते हैं, एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। तब उनके बीच हस्तक्षेप करने वाला कोई नहीं होता। लेकिन पति-पत्नी में यदि सामजस्य बैठ जाता है उन परिस्थितियों में प्रेम विवाह भी सफल सिद्ध होता है।
नियोजित विवाह करने की एक वजह यह भी है कि जैसे हम बच्चों की खुशी माता-पिता के लिए संसार के सब भौतिक सुख-सुविधाओं से बढ़कर होती है, वह हमारी परवरिश में जमीन-आसमान एक कर देते हैं, ठीक उसी तरह माता पिता के लिए इतना योगदान तो हम भी कर सकते हैं। एक खास बात और है कि यदि दो पक्षों की सहमति से हुए नियोजित विवाह में खटपट हो भी जाती है तब  माता-पिता तथा अन्य रिश्तेदारों के हस्तक्षेप के बाद इस रिश्ते में सुधार हो सकता है।
          ध्यान रखें बच्चों व माता-पिता की सोच का एक स्तर पर मिलना जरूरी है। एक ही लड़का-लड़की को देख कर रिश्ता फाइनल करने की जल्दबाजी न करें, उनके सामने एक-दो आॅप्शन रखें तथा उन्हें आपस में मिलने का मौका जरूर दें।
हिंदू रीति में पणिग्रहण संस्कार
              हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। विवाह = वि +वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) निर्वाह करना। पणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन   तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
           हिंदू मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों (ब्रम्हचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम) में विभक्त किया गया है और गृहस्थ आश्रम के लिये पाणिग्रहण संस्कार अर्थात् विवाह नितांत आवश्यक है। हिंदू विवाह में शारीरिक संम्बंध केवल वंश वृद्धि के उद्देश्य से ही होता है। हिन्दू विवाह में सात प्रकार के विवाह को मान्यता दी जाती है। 
1. ब्रह्म विवाह दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना ब्रह्म विवाह कहलाता है। सामान्यत: इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है।
2. दैव विवाह किसी सेवा कार्य (विशेषत: धार्मिक अनुष्ठान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना दैव विवाह कहलाता है।
3. आर्श विवाह कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यत: गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना अर्श विवाह कहलाता है।
4. प्रजापत्य विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना प्रजापत्य विवाह कहलाता है।
5. गंधर्व विवाह परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना गंधर्व विवाह कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से गंधर्व विवाह किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम भारत वर्ष बना।
6. असुर विवाह कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना असुर विवाह कहलाता है।
7. राक्षस विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना राक्षस विवाह कहलाता है।
8. पैशाच विवाह कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है।

1 टिप्पणी:

  1. भाई रतन जी,
    आपने जिस विषय पर आलेख लिखा है, वह विषय काफी पुराना है। लेकिन आपका यह नजरिया काफी अच्छा है कि यदि मां-बाप की अनुमति लेकर विवाह किया जाए तो उसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। जिस मां-बाप ने बड़े अरमान के साथ आपको पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया है, उसके अरमानों पर पानी फेरते हुए प्रेम विवाह के लिए घर से भाग जाना या उनकी अनुमति के बिना कोर्ट में शादी कर लेना कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। इस लेख के लिए आपको कोटिश: धन्यवाद!

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पैरेंट्स का आशीर्वाद यानी आल द बेस्ट!


हमारा समाज आज भी पुरानी मान्यताओं और परंपराओं से जुड़ा है। हम वातावरण, कपड़ों और कॅरिअर के नजरिए से आधुनिक जरूर हुए हैं, पर सोच अभी भी पूरी तरह से नहीं बदली है। सपने देखने में कोई बुराई नहीं, पर असल जिंदगी में उनका शत-प्रतिशत सही होना मुश्किल होता है। रिश्ता बनाने से पहले अपनी प्राथमिकताएं निर्धारित करना आवश्यक होता है। अगर 50 प्रतिशत युवा प्रेम विवाह के पक्ष में हैं, तो 50 प्रतिशत पारिवारिक सहमति से नियोजित विवाह करना चाहते हैं। आइडियल कोई नहीं होता, भले ही आप प्रेम करके शादी करें पर रिश्तों की असलियत धीरे-धीरे ही सामने आती है। दरअसल, शादी दो जिंदगियों के मेल से जुड़ा यक्ष प्रश्न है। अब शादी तो करनी ही है पर कौन सी वाली करें? यानी लव मैरिज (प्रेम विवाह) या अरेंज मैरिज (नियोजित विवाह) करें। मॉडर्न ख्यालों से सराबोर 21वीं सदी की पीढ़ी आज भी लव कम अरेंज मैरिज के कांसेप्ट में रुचि ले रही है। अरेंज मैरिज एक ऐसा मंच है जहां दो लोगों, परिवारों को आमने-सामने आकर एक-दूसरे को जानने, समझने और परखने के बाद संबंधों को जोड़ने का अवसर मिलता है।
जिस तरह प्रेम विवाह में आप पहले से एक दूसरे को जानते हैं, वैसा ही मौका आपको नियोजित विवाह में भी मिलता है।
         प्रेम संबंध एक ऐसा संबंध है जिसमें आपकी भावनाओं की कद्र हो। पति-पत्नी का रिश्ता विश्वास की नींव पर टिका होता है। जब यह विश्वास संशय में बदल जाता है तब वैवाहिक जीवन पर संकट के बादल गहराने लगते हैं। इस स्थिति से कैसा उबरा जाये इस प्रश्न का उत्तर हमें तलाशना चाहिए।
अनुशासन बनाए रखने का माध्यम
           प्राचीन काल में विवाह समाज में अनुशासन तथा व्यवस्था बनाये रखने का माध्यम रहा है।  नियोजित विवाह पद्धति के बिना समाज मुक्त यौन संबंधों की अराजकता में भटक गया होता। नियोजित विवाह का स्वरूप, प्रकृति एवं क्रिया विधि विभिन्न समाजों में एक प्रकार की नहीं होतीं। एडवर्ड वैस्टरमार्क के अनुसार विवाह का अर्थ नियमों तथा रीति-रिवाजों के संयोजन से है, अर्थात किसका विवाह किससे किस विधि एवं किस परिस्थिति में होगा। विवाह होने के बाद दांपत्य में बंधने वाले स्त्री-पुरुष के अधिकार एवं कर्त्तव्य किस प्रकार के तथा कैसे होंगे साथ ही आपस में अनबन हो जाने पर वह किस प्रकार अलग हो सकते हैं। नियोजित विवाह स्त्री-पुरुष का सामाजिक दृष्टि से स्वीकार किया गया तथा मूल्यों की दृष्टि से वांछनीय बंधन है। इस सूत्र में बंधने के बाद यह तय हो जाता है कि विवाहोपरांत पति-पत्नी बने दोनों पक्षों में यौन, आर्थिक अधिकारों का आदान-प्रदान नाजायज नहीं।
            इसके विपरीत आज की युवा पीढ़ी विवाह को मात्र वासना प्रधान प्रेम का रंग दे रही है। रंग, रूप एवं वेष-विन्यास के आकर्षण को पति-पत्नि के चुनाव में प्रेम विवाह कर प्रधानता दी जाने लगी है, यह प्रवृत्ति बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है । यदि लोग इसी तरह सोचते रहे, तो दाम्पत्य-जीवन शरीर प्रधान रहने से एक प्रकार के वैध-व्यभिचार का ही रूप धारण कर लेगा। पाश्चात्य जैसी स्थिति भारत में भी आ जायेगी। शारीरिक आकषर्ण की न्यूनाधिकता का अवसर सामने आने पर विवाह जल्दी-जल्दी टूटते-बनते रहेंगे। आज का युवा पत्नी का चुनाव शारीरिक आकषर्ण को ध्यान में रखकर  ही करता है। अगर प्रेम विवाह कर भी लिया जाए तो मात्र आकर्षण के बलबूते दांपत्य जीवन लंबे समय तक नहीं चल पाता। कुछ लोग परिवारजनों से बगावत कर अलग दुनिया बसाने का रंगीन सपना संजो लेते हैं। लेकिन जब यही आकर्षण कम हो जाता है और पारिवारिक जिम्मेदारियां समझ में आती हैं तब स्थिति बदल जाती है यानि प्रेम विवाह के दुष्परिणाम सामने आते हैं। अब ऐसे में सिवाए पछताने के और कोई विकल्प नहीं होता।
           समय रहते इस बढ़ती हुई प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए और शारीरिक आकषर्ण की उपेक्षा कर सद्गुणों तथा सद्भावनाओं को ही विवाह का आधार पूवर्काल की तरह बने रहने देना चाहिए। शरीर का नहीं आत्मा का सौन्दयर् देखा जाए और साथी में जो कमी है, उसे प्रेम, सहिष्णुता, आत्मीयता एवं विश्वास की छाया में जितना सम्भव हो सके, सुधारना चाहिए, जो सुधार न हो सके, उसे बिना असन्तोष लाये सहन करना चाहिए। इस रीति-नीति पर दाम्पत्य जीवन की सफलता निर्भर है। अत: दोनों पक्षों को एक-दूसरे से आकषर्ण लाभ मिलने की बात न सोचकर एक-दूसरे के प्रति आत्म-समपर्ण करने और सम्मिलित शक्ति उत्पन्न करने, उसके जीवन विकास की सम्भावनाएँ उत्पन्न करने की बात सोचनी चाहिए। चुनाव करते समय तक साथी को पसन्द करने न करने की छूट है।  जो कुछ देखना, ढूँढ़ना, परखना हो, वह कार्य विवाह से पूर्व ही समाप्त कर लेना चाहिए। जब विवाह हो गया, तो फिर यह कहने की गुंजाइश नहीं रहती कि भूल हो गई, इसलिए साथी की उपेक्षा की जाए। जिस प्रकार के भी गुण-दोष युक्त साथी के साथ विवाह बन्धन में बँधें, उसे अपनी ओर से कर्त्तव्यपालन समझकर पूरा करना ही एक मात्र मार्ग रह जाता है। इसी के लिए विवाह संस्कार का आयोजन किया जाता है। समाज के सम्भ्रान्त व्यक्तियों की, गुरुजनों की, कुटुम्बी-सम्बन्धियों की, देवताओं की उपस्थिति इसीलिए इस धर्मानुष्ठान के अवसर पर आवश्यक मानी जाती है कि दोनों में से कोई इस कत्तर्व्य-बन्धन की उपेक्षा करे, तो उसे रोकें और प्रताड़ित करें। पति-पत्नी इन सन्भ्रान्त व्यक्तियों के सम्मुख अपने विश्वास और सफल   जीवन व्यतीत करने की घोषणा करते हैं। यह प्रतिज्ञा समारोह ही विवाह संस्कार है। उन्हें बताया जाता है कि कोई किसी पर न तो हुकूमत जमायेगा और न अपने दुर्व्यवहार रखकर अपने लाभ या अहंकार की पूर्ति करना चाहेगा। वरन् वह करेगा, जिससे साथी को सुविधा मिलती हो।  दोनों अपनी इच्छा आवश्कता को गौण और साथी की आवश्यकता को मुख्य मानकर सेवा और सहायता का भाव रखेंगे, उदारता एवं सहिष्णुता बरतेंगे, तभी गृहस्थी का रथ ठीक तरह आगे बढ़ेगा।  इस तथ्य को दोनों भली प्रकार हृदयंगम कर लें और इसी रीति-नीति को आजीवन अपनाये रहने का व्रत धारण करें, इसी प्रयोजन के लिए यह पुण्य-संस्कार आयोजित किया जाता है। इस बात को दोनों भली प्रकार समझ लें और सच्चे मन से स्वीकार कर लें, तो ही विवाह-बन्धन में बँधें। विवाह संस्कार आरम्भ करने से पूर्व या विवाह वेदी पर बिठाकर दोनों को यह तथ्य भली प्रकार समझा दिया जाए और उनकी सहमति माँगी जाए।  यदि दोनों इन आदर्शों को अपनाये रहने की हार्दिक सहमति-स्वीकृति दें, तो ही विवाह संस्कार आगे बढ़ाया जाए ।
माता-पिता पर रखें विश्वास
बचपन से बडेÞ होने तक माता-पिता हर तरह की जिम्मेदारी निभाते हैं। इसलिए शायद यह उनके अधिकार क्षेत्र में आता है कि वे अपने बच्चों की शादी भी अपनी समझदारी और बच्चों की पसंद से करें।
शादी को लेकर लड़के-लड़की के मन में एक इनफिनिट प्रेम होता है। जिसमें सबकी पसंद अक्सर एक जैसी होती है, यानि अच्छा वर, अच्छा घर, अच्छा आचरण, गुड लुकिंग, एजुकेटेड तथा समझदार हो। कहने का तात्पर्य है सब कुछ अच्छा चाहिए। पर जहां अरेंज मैरिज (नियोजित विवाह) की बात आती है, तब शादी के इच्छुक लड़के-लड़कियां माता-पिता की मर्जी से शादी करने में खुद को सुरक्षित पाते हैं। सुरक्षा का आवरण पाते ही, शादी से जुड़ा डर दूर हो जाता है। वे सारी शर्तें माता-पिता को बताकर ‘उनका भावी जीवन साथी कैसा हो’ खुद बेफिक्र हो जाते हैं इसलिए कि उनके माता-पिता उनके भविष्य को लेकर चिंतित व चौकस हैं।
          हमारे समाज में मान्यताओं के अनुसार अरेंज मैरिज सम्मान की ज्यादा हकदार होती है। प्रेम विवाह जैसी मुश्किलें अरेंज मैरिज में नहीं रहतीं। जहां पहले किसी से प्यार होता है फिर अगर घर-परिवार वाले रजामंद न हों तो बैठकर रोते रहो। नियोजित विवाह हमें ऐसे झंझटों से बचाता है। शादी कोई बच्चों का खेल नहीं! आप इस मैदान के नये खिलाड़ी हो सकते हैं पर माता-पिता सब कुछ जानने-पहचानने के बाद ही आपकी शादी करते हैं। अपने बच्चों की शादी को लेकर हर माता-पिता के ढेरों सपने होते हैं। फिर वे किसी गलत व्यक्ति से नाता जोड़कर हम पर भला कैसे थोप सकेंगे। नियोजित विवाह में बकायदा हमारी राय सिर्फ इसलिए ही पूछी जाती है।
          ऐसा नहीं कि हमेशा अरेंज मैरिज ही सफल सिद्ध हो यह भी कभी-कभी आपसी सामजस्य सही न बैठने पर असफल हो जाती है। लेकिन प्रेम विवाह करने के बाद पति-पत्नी में यदि झगड़े बढ़ जाते हैं, चूंकि यह फैसला उनका अपना होता है माता-पिता तथा अन्य परिजनों की इच्छा के खिलाफ किया था इसलिए उनकी इजाजत के बिना ही वह सम्बन्ध विच्छेद भी कर लेते हैं, एक-दूसरे से अलग हो जाते हैं। तब उनके बीच हस्तक्षेप करने वाला कोई नहीं होता। लेकिन पति-पत्नी में यदि सामजस्य बैठ जाता है उन परिस्थितियों में प्रेम विवाह भी सफल सिद्ध होता है।
नियोजित विवाह करने की एक वजह यह भी है कि जैसे हम बच्चों की खुशी माता-पिता के लिए संसार के सब भौतिक सुख-सुविधाओं से बढ़कर होती है, वह हमारी परवरिश में जमीन-आसमान एक कर देते हैं, ठीक उसी तरह माता पिता के लिए इतना योगदान तो हम भी कर सकते हैं। एक खास बात और है कि यदि दो पक्षों की सहमति से हुए नियोजित विवाह में खटपट हो भी जाती है तब  माता-पिता तथा अन्य रिश्तेदारों के हस्तक्षेप के बाद इस रिश्ते में सुधार हो सकता है।
          ध्यान रखें बच्चों व माता-पिता की सोच का एक स्तर पर मिलना जरूरी है। एक ही लड़का-लड़की को देख कर रिश्ता फाइनल करने की जल्दबाजी न करें, उनके सामने एक-दो आॅप्शन रखें तथा उन्हें आपस में मिलने का मौका जरूर दें।
हिंदू रीति में पणिग्रहण संस्कार
              हिंदू धर्म में विवाह को सोलह संस्कारों में से एक संस्कार माना गया है। विवाह = वि +वाह, अत: इसका शाब्दिक अर्थ है - विशेष रूप से (उत्तरदायित्व का) निर्वाह करना। पणिग्रहण संस्कार को सामान्य रूप से हिंदू विवाह के नाम से जाना जाता है। अन्य धर्मों में विवाह पति और पत्नी के बीच एक प्रकार का करार होता है जिसे कि विशेष परिस्थितियों में तोड़ा भी जा सकता है परंतु हिंदू विवाह पति और पत्नी के बीच जन्म-जन्मांतरों का सम्बंध होता है जिसे कि किसी भी परिस्थिति में नहीं तोड़ा जा सकता। अग्नि के सात फेरे ले कर और ध्रुव तारा को साक्षी मान कर दो तन, मन   तथा आत्मा एक पवित्र बंधन में बंध जाते हैं। हिंदू विवाह में पति और पत्नी के बीच शारीरिक संम्बंध से अधिक आत्मिक संम्बंध होता है और इस संम्बंध को अत्यंत पवित्र माना गया है।
           हिंदू मान्यताओं के अनुसार मानव जीवन को चार आश्रमों (ब्रम्हचर्य आश्रम, गृहस्थ आश्रम, सन्यास आश्रम तथा वानप्रस्थ आश्रम) में विभक्त किया गया है और गृहस्थ आश्रम के लिये पाणिग्रहण संस्कार अर्थात् विवाह नितांत आवश्यक है। हिंदू विवाह में शारीरिक संम्बंध केवल वंश वृद्धि के उद्देश्य से ही होता है। हिन्दू विवाह में सात प्रकार के विवाह को मान्यता दी जाती है। 
1. ब्रह्म विवाह दोनो पक्ष की सहमति से समान वर्ग के सुयोज्ञ वर से कन्या का विवाह निश्चित कर देना ब्रह्म विवाह कहलाता है। सामान्यत: इस विवाह के बाद कन्या को आभूषणयुक्त करके विदा किया जाता है।
2. दैव विवाह किसी सेवा कार्य (विशेषत: धार्मिक अनुष्ठान) के मूल्य के रूप अपनी कन्या को दान में दे देना दैव विवाह कहलाता है।
3. आर्श विवाह कन्या-पक्ष वालों को कन्या का मूल्य दे कर (सामान्यत: गौदान करके) कन्या से विवाह कर लेना अर्श विवाह कहलाता है।
4. प्रजापत्य विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका विवाह अभिजात्य वर्ग के वर से कर देना प्रजापत्य विवाह कहलाता है।
5. गंधर्व विवाह परिवार वालों की सहमति के बिना वर और कन्या का बिना किसी रीति-रिवाज के आपस में विवाह कर लेना गंधर्व विवाह कहलाता है। दुष्यंत ने शकुन्तला से गंधर्व विवाह किया था. उनके पुत्र भरत के नाम से ही हमारे देश का नाम भारत वर्ष बना।
6. असुर विवाह कन्या को खरीद कर (आर्थिक रूप से) विवाह कर लेना असुर विवाह कहलाता है।
7. राक्षस विवाह
कन्या की सहमति के बिना उसका अपहरण करके जबरदस्ती विवाह कर लेना राक्षस विवाह कहलाता है।
8. पैशाच विवाह कन्या की मदहोशी (गहन निद्रा, मानसिक दुर्बलता आदि) का लाभ उठा कर उससे शारीरिक सम्बंध बना लेना और उससे विवाह करना पैशाच विवाह कहलाता है।

1 टिप्पणी:

  1. भाई रतन जी,
    आपने जिस विषय पर आलेख लिखा है, वह विषय काफी पुराना है। लेकिन आपका यह नजरिया काफी अच्छा है कि यदि मां-बाप की अनुमति लेकर विवाह किया जाए तो उसके सकारात्मक परिणाम सामने आते हैं। जिस मां-बाप ने बड़े अरमान के साथ आपको पढ़ा-लिखाकर बड़ा किया है, उसके अरमानों पर पानी फेरते हुए प्रेम विवाह के लिए घर से भाग जाना या उनकी अनुमति के बिना कोर्ट में शादी कर लेना कतई उचित नहीं कहा जा सकता है। इस लेख के लिए आपको कोटिश: धन्यवाद!

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