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सुना था कभी बचपन में "खुदी को कर इतना बुलंद बन्दे, की हर तकदीर से पहले, खुदा तुझ से पूछे बोल तेरी रजा क्या है" जो लोग सफलता पाने के लिए जद्दोजहद करते रहते हैं ये लाइनें उन पर फिट बैठती हैं. खुद को उसी धारा से जोड़कर चल पड़े हैं, अभी रास्ते में हूँ यही कहना ठीक है. सफलता के चरम को पा सकेंगे ये जुनून है दिल में, अभी इन्तजार है सही वक्त का. जब स्थितियां अनुकूल न हों, तो सही वक्त का इंतजार करना चाहिए, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि आप हाथ पर हाथ धरे बैठे रहें। मुश्किल वक्त का प्रयोग खुद को मजबूत करने में करना चाहिए। स्लो-डाउन से तो लगभग सभी क्षेत्र प्रभावित हुए हैं, मेरा ये ब्लॉग एक कोशिश है, खुद को, अपने विचारो को दूसरों से विनिमय करने की. आपकी आलोचना भी सह सकता हूँ, क्योंकि मेरा मानना है की हमारे प्यारे आलोचक भी हमें आगे बढ़ने की प्रेरणा देते हैं, प्रेरणा देने के लिए बस जरूरत है लेख के धरातल पर टिप्पणी नामक अंगूठा लगाने की. इसी उम्मीद के साथ आपका मेरे ब्लॉग पर स्वागत है.....

रविवार, 19 दिसंबर 2010

चापलूसी का शोक

आपने देखा हो या नहीं पर मुझे ऐसा देखने का खासा तजुर्बा है आप कह सकते हैं। कई बार देखने में आता रहता है कि किस तरह साधारण, लक्षणहीन, अनाड़ी तथा असभ्य लोग केवल खुशामद करके कोर्इ बड़ा पद पा लेते हैं। ऐसा नहीं कि इन्होंने इस पद को पाने के लिए कोर्इ कसरत नहीं की। अब सवाल यह उठता है कि जब यह लोग साधारण, लक्षणहीन, अनाड़ी तथा असभ्य है तो फिर कैसे इन्हें गरिमामयी पद की प्राप्ति हो जाती है। मान्यवर, इसके पीछे उनकी चापलूसी करने की प्रतिभा छुपी रहती है।
     चलिए अब आपको विस्तार पूर्वक बतलाते हैं अच्छा चापलूस बनने के लिए किन गुणों का होना खासा महत्व रखता है। वैसे तो चापलूसी की कला काफी प्राचीन है। इसकी शुरुआत कब से शुरू हुई यह बताना मेरे लिए काफी कठिन है। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि जब से प्रतिस्पर्धा, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ शुरू हुई होगी तथा बिना कुछ किए सब कुछ पाने की तमन्ना इंसान में जागी होगी तभी से इसका जन्म भी हुआ होगा। जनाब! चापलूसी का मतलब है बड़े साहब को प्रसन्न करने के लिए उनकी झूठी प्रशंसा करना, गलत ही सही पर उनकी हर बात पर वाह-वाह करना, अपने स्वार्थ को साधने के लिए दूसरों का अहित करने के लिए झूठी बातें बनाना, मन में मक्कारी छुपाकर मुस्कराहट और मीठी तथा ज्ञानपूर्ण बातों का प्रयोग करना।
     वर्तमान युग में चापलूसी करने में माहिर होना बहुत जरूरी है। अगर आप किसी को तन की शक्ति से हरा नहीं सकते, अर्थात आप दुर्बल हैं, तो आप चापलूसी का सहारा लेकरआसानी से सामने वाले का तीया-पांचा कर सकते हैं। अपना घर चलाने के लिए यह पात्र किसी भी हद दर्जे की हरकत आपके साथ करने से नहीं चूकेगा। जाने कितने घर मात्र चापलूसी करने से ही चल रहे हैं। डिग्रियों वाले और तुजुर्बेकार मुंह की खाते हैं और चापलूस मजे से मक्खन लगाकर पेट भर रहे हैं।
     चापलूसी की मात्रा पुरुषों में कम और स्त्रियों में अधिक पाई जाती है। क्योंकि यह शब्द स्वयं ही स्त्रीलिंग है। ईश्वर भी चापलूस भक्तों से ही खुश रहता है इसलिए बंधुओं चापलूसों से सदा सावधान रहना ही हितकर होता है। 'कर्म ही प्रधान है, बिना कर्म किए आपको सफलता नहीं मिलेगी' ऐसा सोचना भी अब महापाप है। जनाब! चापलूसी करिए मस्त रहिए। ओशो का कहना है कि ह्यजो व्यक्ति आपसे मीठी-मीठी बातें करे समझ लीजिये वह आपके पेट का रस ले रहा है, बोलचाल में मिठास और जीभ कड़वी होती है। अपनी कमियों को छिपाने के लिए चापलूस व्यक्ति अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रशंसा द्वारा दूसरे का अपमान बहुत अच्छी तरह कर सकते हैं। चापलूस व्यक्ति किसी का कहीं भी अपमान कर सकते हैं, दूसरों के कार्य की प्रशंसा करना उनके लिए हिमालय से कूदने के बराबर होता है। मात्र दिखावे की बातें बनाना, तारीफ करनी हो तो मुंह पिचका लेते हैं और यदि किसी ने गलत कार्य किया तो ऊंचा ही बोलेंगे ताकि अन्य लोगों में उनका प्रभाव और छवि साफ-सुथरी बनी रहे, कुल मिलाकर दोस्तों ऐसे लोगों का खुद का कोई चरित्र ही नहीं होता। ऐसे व्यक्ति चापलूस होते हुए भी कभी ये मानने को तैयार नहीं होते कि वह चापलूस हैं।
     जब इतनी सारी खूबियों से भरपूर है यह चापलूसी तो फिर इसे हमारा समाज या कोर्इ संस्थान उन्हें चापलूसी का पद क्यों नहीं देता उनके अधिकारों से उन्हें क्यों वंचित किया जाता है। सही बात तो यह है बंधुओं की अगर ऐसे लोगों का किसी संस्थान में कोई पद हो भी तो पता है क्या स्तिथि होगी। ऐसा होने पर इनसे लोग दूर भागने लगेंगे, उनके आते ही मुंह पर उंगली रख ली जाया करेगी कि कहीं साहब का चापलूस सुन न ले। दूसरी बात यह कि किसी भी संस्थान में ऐसे व्यक्ति को पद मिलने के बाद ही इस पद की प्राप्ति हो पाती है। वह यह देख लेता है कि संस्थान में किसका सिक्का ज्यादा चलता है, इतना पता चलते ही वह उक्त साहब के लिए जी-तोड़ मस्का मजदूरी करने लगता है।
     राजनीति का क्षेत्र हो या फिल्मी दुनिया की चकाचौंध, कैसा भी बड़ा अथावा छोटा संस्थान हो चापलूसों से आप बच नहीं सकते। यह आपको हर क्षेत्र में बिना ढूंढे ही मिल सकते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने शिकार को खुद ही तलाश लेता है। बहरहाल मित्रों, जिस दिन इस चापलूसी का अंत होगा, मैं इसका शोक जरूर मनाऊंगा।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सही जनाब।।।। व्यक्ति की अपनी कोई गरिमा तो बची ही नहीं है... लोग इतने चालाक हैं कि बड़े चालाकी से यह काम करते हैं। कुछ लोगों को तो इसमें निपुणता हासिल है।.

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चापलूसी का शोक

आपने देखा हो या नहीं पर मुझे ऐसा देखने का खासा तजुर्बा है आप कह सकते हैं। कई बार देखने में आता रहता है कि किस तरह साधारण, लक्षणहीन, अनाड़ी तथा असभ्य लोग केवल खुशामद करके कोर्इ बड़ा पद पा लेते हैं। ऐसा नहीं कि इन्होंने इस पद को पाने के लिए कोर्इ कसरत नहीं की। अब सवाल यह उठता है कि जब यह लोग साधारण, लक्षणहीन, अनाड़ी तथा असभ्य है तो फिर कैसे इन्हें गरिमामयी पद की प्राप्ति हो जाती है। मान्यवर, इसके पीछे उनकी चापलूसी करने की प्रतिभा छुपी रहती है।
     चलिए अब आपको विस्तार पूर्वक बतलाते हैं अच्छा चापलूस बनने के लिए किन गुणों का होना खासा महत्व रखता है। वैसे तो चापलूसी की कला काफी प्राचीन है। इसकी शुरुआत कब से शुरू हुई यह बताना मेरे लिए काफी कठिन है। लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि जब से प्रतिस्पर्धा, एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ शुरू हुई होगी तथा बिना कुछ किए सब कुछ पाने की तमन्ना इंसान में जागी होगी तभी से इसका जन्म भी हुआ होगा। जनाब! चापलूसी का मतलब है बड़े साहब को प्रसन्न करने के लिए उनकी झूठी प्रशंसा करना, गलत ही सही पर उनकी हर बात पर वाह-वाह करना, अपने स्वार्थ को साधने के लिए दूसरों का अहित करने के लिए झूठी बातें बनाना, मन में मक्कारी छुपाकर मुस्कराहट और मीठी तथा ज्ञानपूर्ण बातों का प्रयोग करना।
     वर्तमान युग में चापलूसी करने में माहिर होना बहुत जरूरी है। अगर आप किसी को तन की शक्ति से हरा नहीं सकते, अर्थात आप दुर्बल हैं, तो आप चापलूसी का सहारा लेकरआसानी से सामने वाले का तीया-पांचा कर सकते हैं। अपना घर चलाने के लिए यह पात्र किसी भी हद दर्जे की हरकत आपके साथ करने से नहीं चूकेगा। जाने कितने घर मात्र चापलूसी करने से ही चल रहे हैं। डिग्रियों वाले और तुजुर्बेकार मुंह की खाते हैं और चापलूस मजे से मक्खन लगाकर पेट भर रहे हैं।
     चापलूसी की मात्रा पुरुषों में कम और स्त्रियों में अधिक पाई जाती है। क्योंकि यह शब्द स्वयं ही स्त्रीलिंग है। ईश्वर भी चापलूस भक्तों से ही खुश रहता है इसलिए बंधुओं चापलूसों से सदा सावधान रहना ही हितकर होता है। 'कर्म ही प्रधान है, बिना कर्म किए आपको सफलता नहीं मिलेगी' ऐसा सोचना भी अब महापाप है। जनाब! चापलूसी करिए मस्त रहिए। ओशो का कहना है कि ह्यजो व्यक्ति आपसे मीठी-मीठी बातें करे समझ लीजिये वह आपके पेट का रस ले रहा है, बोलचाल में मिठास और जीभ कड़वी होती है। अपनी कमियों को छिपाने के लिए चापलूस व्यक्ति अपने मुंह मियां मिट्ठू बनते हैं। ऐसे व्यक्ति प्रशंसा द्वारा दूसरे का अपमान बहुत अच्छी तरह कर सकते हैं। चापलूस व्यक्ति किसी का कहीं भी अपमान कर सकते हैं, दूसरों के कार्य की प्रशंसा करना उनके लिए हिमालय से कूदने के बराबर होता है। मात्र दिखावे की बातें बनाना, तारीफ करनी हो तो मुंह पिचका लेते हैं और यदि किसी ने गलत कार्य किया तो ऊंचा ही बोलेंगे ताकि अन्य लोगों में उनका प्रभाव और छवि साफ-सुथरी बनी रहे, कुल मिलाकर दोस्तों ऐसे लोगों का खुद का कोई चरित्र ही नहीं होता। ऐसे व्यक्ति चापलूस होते हुए भी कभी ये मानने को तैयार नहीं होते कि वह चापलूस हैं।
     जब इतनी सारी खूबियों से भरपूर है यह चापलूसी तो फिर इसे हमारा समाज या कोर्इ संस्थान उन्हें चापलूसी का पद क्यों नहीं देता उनके अधिकारों से उन्हें क्यों वंचित किया जाता है। सही बात तो यह है बंधुओं की अगर ऐसे लोगों का किसी संस्थान में कोई पद हो भी तो पता है क्या स्तिथि होगी। ऐसा होने पर इनसे लोग दूर भागने लगेंगे, उनके आते ही मुंह पर उंगली रख ली जाया करेगी कि कहीं साहब का चापलूस सुन न ले। दूसरी बात यह कि किसी भी संस्थान में ऐसे व्यक्ति को पद मिलने के बाद ही इस पद की प्राप्ति हो पाती है। वह यह देख लेता है कि संस्थान में किसका सिक्का ज्यादा चलता है, इतना पता चलते ही वह उक्त साहब के लिए जी-तोड़ मस्का मजदूरी करने लगता है।
     राजनीति का क्षेत्र हो या फिल्मी दुनिया की चकाचौंध, कैसा भी बड़ा अथावा छोटा संस्थान हो चापलूसों से आप बच नहीं सकते। यह आपको हर क्षेत्र में बिना ढूंढे ही मिल सकते हैं। ऐसा व्यक्ति अपने शिकार को खुद ही तलाश लेता है। बहरहाल मित्रों, जिस दिन इस चापलूसी का अंत होगा, मैं इसका शोक जरूर मनाऊंगा।

1 टिप्पणी:

  1. बहुत सही जनाब।।।। व्यक्ति की अपनी कोई गरिमा तो बची ही नहीं है... लोग इतने चालाक हैं कि बड़े चालाकी से यह काम करते हैं। कुछ लोगों को तो इसमें निपुणता हासिल है।.

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